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Thursday, 25 September 2014

बेबसी




दिल को खलता है ये शुष्क-कोरा कागज,
पर इसे अल्फाज़ो में भिगौना अच्छा नहीं लगता | 

हर लम्हे को फुरसत से जीना चाहता हुँ | 
पर इस जहाँ में इक पल बिताना अब अच्छा नहीं लगता | 


लफ्ज़, लबों से बाहर निकलने की मशक्कत करते है,
पर उन्हें आवाज़ में पिरौना अब अच्छा नहीं लगता | 

मय से इक रूहानी सुकूं मिलता है,
पर न जाने क्यों मैख़ाने में जाना अब अच्छा नहीं लगता | 


उसे अपलक निहारने की अज़ीब सी दिल्लगी रहती है,
पर उन तंग गलियों में जाना अब अच्छा नहीं लगता | 


उनके खयालो में खोया रहना चाहता हुँ,
पर यूं बेवजह रात-रात भर रोना अब अच्छा नहीं लगता | 



Aniruddh Nandwana
Y13 Undergraduate, The LNMIIT

Monday, 8 September 2014

जलवायु परिवर्तन

जलवायु मे हो रहा परिवर्तन

क्या मनुष्यों को प्रकृति के सामने करना पड़ेगा आत्मसमर्पण



दूषित हुईनदियाँ कट गए पेड़

मनुष्यों ने अपने फायदे के लिए प्रकृति से खेला खेल

जब खेला है खेल तो प्रकृति कैसे रहती पीछे

उसने भी चली चाल पीछे पीछे



मनुष्यों के प्रहार से प्रकृति ने बदला व्यव्हार

इस व्हाय्व्हार से मनुष्य हुआ बेहाल

तापमान बदला मौसम बदले

प्राकृतिक आपदाओं की हुई भरमार



जलवायु मे हो रहा परिवर्तन

क्या मनुष्यों को प्रकृति के सामने करना पड़ेगा आत्मसमर्पण



अब भी समय है जाग जा मनुष्य

प्रकृति के सामने हार जा मनुष्य

प्रकृति कर देगी तेरा बुरा हाल

समझौता करके रह खुशहाल



पेड़ लगा, प्रदुषण रोक

प्रकृति को मत करने दे तेरा भोग

अपनी धरती माँ को बचा

प्रकृति को तू ना सता



जलवायु मे हो रहा परिवर्तन
क्या मनुष्यों को प्रकृति के सामने करना पड़ेगा आत्मसमर्पण



Gaurav Hans
Y14 Undergraduate, The LNMIIT
 

Saturday, 22 February 2014

वक्त


चलो न वक्त ए दरिया में उतरे | 
उसमे बह रहे लम्हों को पकड़ कर गोते लगाए,
हर पल की कैफियत को तस्स्वुर से निहारें,
इसमें डूब रहे फसानो को बाँहों में लेलें | 

चलो न वक्त ए दरिया में उतरे |
इसमें अपना चेहरा देखें और खुद की शिनाख्त करें 
आओ न इस दरिया में हाथों की लकीरों को मिटा डालें,
और अपने मुस्तकबिल को मुकम्मल बना लें | 

चलो न वक्त ए दरिया में उतरे |
इसमें कांटा डाले और मुख्तलिफ लम्हातो 
में से खुशनुमा पलो को पकडे,
आओ हम इसमें घुली गम की गर्दो को अलग कर लें | 

चलो न वक्त ए दरिया में उतरे |
आशाओ की कश्ती में होंसलो की बादबानी बांधे,
एक जुनूनी सी पतवार थामे,
इसमें आने वाली अज़ाब ए लहरो का सामना करें,
कहीं दूर चले, बहते चलें, फिरदौस चलें |



Aniruddh Nandwana
Y13 Undergraduate, The LNMIIT

Monday, 20 January 2014

बड़ा ज़ाहिल है इश्क़ मेरा



बात बेबात की बात करता है,
रातें जलाता है,
बेमतलब हंसता है,
बड़ा ज़ाहिल है इश्क़ मेरा | 

दामन छोड़ के य़ू उठ चला,
न सोचा न समझा,
ऐसी अल्लहड़ सी बातें करता है,
बड़ा ज़ाहिल है इश्क़ मेरा | 

मेरे हिस्से का नशा सितारों को पिलाता है,
वो नीला आसमां भला कितना ऊपर जाएगा,
देखो बावरा सा दिल मेरा,
बड़ा ज़ाहिल है इश्क़ मेरा |


Ajay Singh Rathore
Y09 Undergraduate, The LNMIIT

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Tuesday, 8 October 2013

चलो राउंड पर चलते है .....!!

Photo Credit: Ratika Garg


ग्रेड की टेंशन ...
प्रोजेक्ट में चाहिए एक्सटेंशन ...
लोगो का अटेंशन 
तो चल राउंड पर चलते है ...


थोड़ा खाया या ज्यादा , फर्क नहीं पड़ता ...
मेस के खाने से हर कोई है सड़ता ...
जेब में हो पैसे तो कैंटीन में खाते है ...
वरना रात भर भूक से दरवाजे खटखटाते है .....


क्लास में हो मज़ा या दिन भर सज़ा .....
5 बजे का घंटा बजा ...
तो चल राउंड पर चलते है ...


अपनी पसंद पर कोई हाथ साफ़ करे ..
दिल के टुकड़े देख बाकि सब मजे करे ...
सिर्फ सच्चा दोस्त दिलासा भरे… 
और फिर 10 की लस्सी ले...हम राउंड पर चले ...


ज्यादा बिजी लोग अकेले ही चले… 
बड़े लोग दीदियों के साथ चले ...
"पता नहीं अपनी कब होगी " कहते हुए बाकियों क दिल जले… 
रोज की यही कहानी पर तब भी सब राउंड पर चले ....


थड़ी पर फेफडों को दुखाना ...
या गणेश पर भूक हो मिटाना ....
क्लासेज के बाद हो उठना ..
या नाश्ता कर क सोजाना ...


जिधर अपनी भूतपूर्व देवी को देख गति होती है तेज़ ....
रास्ता बदलो या दोबारा याद करो वो डेज़ ...
यहाँ दिन कभी ग्राउंड तो कभी हाई होते है… 
चलो यार अपन राउंड पर चलते है ...



Y12 Undergraduate, The LNMIIT